Posts

Showing posts from 2016

इक जनवरी को मैं !!

Image
न काटे से कटूँ ; चीरे चिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न ही घेरे किसी ग़म के घिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न पूछो क्या है मुझसे राज़ लेकिन झूठ ना बोलूँ , किसी भी साल की नचता फिरूँ , इक जनवरी को मैं !! रहूँ चाहे बहुत बीमार सा , इक जनवरी को मैं !! न चल पाऊँ किसी दीवार सा , इक जनवरी को मैं !! रहूँ शीशे सा चकनाचूर , गन्ने सा पिरा लेकिन , मनाता हूँ किसी त्योहार सा , इक जनवरी को मैं !! रहूँ ख़ुश या बला का ग़मज़दा , इक जनवरी को मैं !! मगर तुम देख लेना यह सदा , इक जनवरी को मैं !! रहूँ मस्रूफ़ या फुर्सत , रहूँ घर पर या फिर बाहर , चला आता हूँ खिंचकर मैक़दा , इक जनवरी को मैं !! फँसा था सच फटे से हाल में , इक जनवरी को मैं !!

*मुक्त-ग़ज़ल : 221 - तुझमें ज़िद आर्ज़ू की

Image
उम्र ढलती है मेरी तो ढलती रहे ॥ हाँ जवानी तुम्हारी  सम्हलती रहे ॥ अपनी सब हसरतें मैं मनालूँ अगर , तुझमें ज़िद आर्ज़ू की मचलती रहे ॥ मौत जब तक न आए फ़क़त ज़िंदगी , पाँव बिन भी ग़ज़ब तेज़ चलती रहे ॥ सेंक ले अपनी रोटी तू बेशक़ मगर , दाल मेरी भी यों कर कि गलती रहे ॥ भैंस होगी न गोरी भले रात-दिन , गोरेपन की सभी क्रीम मलती रहे ॥ आदतन आँख पीरी में भी इश्क़ की , हुस्न की चिकनी तह पर फिसलती रहे ॥ इश्क़ की आग इक बार लग जाए फिर , गहरे पानी में भी धू-धू जलती रहे ॥ तू मिले न मिले दिल में हसरत मगर , चाहता हूँ तेरी मुझमें पलती रहे-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 220 - शर्म बैठी है पर्दों में

Image
जैसे ख़ुशबू गुलाबों में भी ना दिखे ॥ उनको नश्शा शराबों में भी ना दिखे ॥ उस हसीं चश्म को भी मैं अंधा कहूँ , हुस्न जिसको गुलाबों में भी ना दिखे ॥ बदनसीब इस क़दर कौन होगा भला , दिलरुबा जिसको ख़्वाबों में भी ना दिखे ? शर्म बैठी हैपर्दों में छिपके कहीं , बेहयाई नकाबों में भी ना दिखे ॥ ढूँढो सहराइयों में न तहज़ीब तुम , अब सलीका जनाबों में भी ना दिखे ॥ अक़्ल उनको कहीं से भी मिलती नहीं , इल्म उनको किताबों में भी ना दिखे ॥ ( हसीं चश्म = सुनयन , सहराइयों = असभ्य ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

*मुक्त-ग़ज़ल : 219 - खा-खा कर ॥

Image
अपनों से बैठे खफ़ा हैं खार खा-खा कर ॥ घूँट पीते ख़ून का खूंख़्वार खा-खा कर ॥ बेबसी में जो न खाना था वही जाँ को ; हम बचाते पड़ गए बीमार खा-खा कर ॥ इस क़दर मज़्बूर हैं हम प्यास से अपनी ; सच बुझाते हैं इसे अंगार खा-खा कर ॥ जीतने को और भी अपनी कमर कसते ; दुश्मनों से हम क़रारी हार खा-खा कर ॥ टीन सी उसकी हुई खाल अपने मालिक से ; चाबुकों की मार हज़ारों बार खा-खा कर ॥ क्या हुआ वो चार दिन के चार भूखे बस ; उठ गए थाली से लुक़्में चार खा-खा कर ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 866 - ये तेरा जिस्म

Image
तू सिर से पाँव तक बेशक निहायत खूबसूरत है ॥
ये तेरा जिस्म संगेमरमरी कुदरत की मूरत है ॥
नहीं बस नौजवानों की , जईफ़ों की भी अनगिनती ;
तू सचमुच मलिका-ए-दिल है , मोहब्बत है , ज़रूरत है ॥
(जईफ़ों = वृद्धों )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 218 - जंगलों की आग बन जा

Image
उनके दिल में कर न तू बसने की तैयारी ॥ उनकी नज़रों में कोई पहले ही है तारी ॥ जंगलों की आग बन जा या तू बड़वानल , वो तुझे समझेंगे फिर भी सिर्फ़ चिंगारी ॥ इससे बचके रहना ही इसका इलाज होता , मत लगा दिल को मोहब्बत जैसी बीमारी ॥ रख खुली खिड़की औ’ रोशनदान वरना दम - घोंट के रख देगी तेरा चार दीवारी ॥ रह्न रख दे अपनी सारी मिल्कियत लेकिन , छोड़ना मत क़र्ज़ की ख़ातिर तू खुद्दारी ॥ तेरी मर्ज़ी कर ले अपने साथ तू धोख़ा , मत कभी अपने वतन से करना ग़द्दारी ॥ साथ उनके मौत सिर पर ज़ुल्फ जैसी थी , उनके बिन तो ज़िंदगी भी बोझ है भारी ॥ ( तारी = छाया हुआ ,बड़वानल = समुद्र के अंदर जलती हुई आग ,रह्न = गिरवी ,मिल्कियत = धन-संपत्ति ,खुद्दारी = स्वाभिमान ,ज़ुल्फ = केश , बाल ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 865 - उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥

Image
पढ़ो तो फ़लसफे की दो अहम किताबें हैं ॥ जो पी सको तो ये न आब ; ये शराबें हैं ॥ मगर क़िले के बंद सद्र दर सी पलकों की ; अभी बड़ी उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥  ( फ़लसफ़ा = दर्शन ,अहम = महत्वपूर्ण ,आब = पानी ,सद्र दर = मुख्य दरवाजा ,नक़ाबें = पर्दा ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 864 - मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥

Image
रात–दिन इस ही जगह पर न थके बैठा हूँ ॥ कब से अपलक मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥ चलके मत आ कि उड़के आ जा सामने मेरे , तेरे दीदार का प्यासा न छके बैठा हूँ ॥ ( तके = देखते हुए , दीदार का = दर्शन का , छके = तृप्त )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 863 - दिल की बात ?

Image
दो , चार न दस-बीस साल बल्कि ताहयात ॥ करवट बदल-बदल के,जाग-जाग सारी रात ॥ समझोगे कैसे तुम दिमाग़दारों ख़ब्त में ; मैंने तो की है शायरी में सिर्फ़ दिल की बात ? ( ताहयात = सारा जीवन , ख़ब्त = पागलपन ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 862 - बाग़ ही बाग़ हैं

Image
रेगज़ारों में भी बरसात की फुहारें हैं ॥ बाग़ ही बाग़ हैं फूलों की रहगुजारें हैं ॥ जब थीं आँखें थे सुलगते हुए सभी मंज़र , जब से अंधे हुए हैं हर तरफ़ बहारें हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 217 - नहीं कोई हाथों में रखता है ' हीरा '

Image
कि सिर फोड़कर या कि पैरों में पड़कर ॥ मुक़द्दर से जीता यहाँ कौन लड़कर ? जिन्हें मिलना है वो भी मिलकर रहेंगे , बिछड़ना है जिनको रहेंगे बिछड़कर ॥ हमेशा नहीं रहते क़ाबिज़ वहाँ पर , गिरें शाख़ से पत्ते पतझड़ में झड़कर ॥ रहोगे अगर रेगमालों में फिर तो , किसी ना किसी दिन रहोगे रगड़कर ॥ नदी की तरह सीख ही लेना बहना , या पोखर के जैसे ही रह जाना सड़कर ॥ अपने हैं जितने वही अपनी दुनिया , लिहाज़ा न अपनों से रहना अकड़कर ॥ वो क्यों छटपटा छूटने को हो आतुर , मोहब्बत ने जिसको रखा हो जकड़कर ? नहीं कोई हाथों में रखता है ' हीरा ', वो जँचता है दरअस्ल ज़ेवर में जड़कर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 861 - किसी उँगली से अपनी

Image
खड़े हो , बैठ उकड़ूँ या कि औंधे लेट ; पर लिखना ॥ लिखे को काट कर या उसको पूरा मेट कर लिखना ॥ किसी उँगली से अपनी नाम मेरा तुम ज़रूर इक दिन ; मेरे चेहरे पे , सीनो पुश्त पे जी – पेट भर लिखना ॥ ( पर = परंतु , सीनो पुश्त = छाती और पीठ , जी = तबीअत )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 860 - हैं भूखे हम बहुत

Image
नहीं ख़स्ता कचौड़ी के , नहीं तीखे समोसे के ॥ नहीं तालिब हैं हम इमली न ख़्वाहिशमंद डोसे के ॥ न लड्डू , पेड़ा , रसगुल्ला ; न रबड़ी के तमन्नाई ; हैं भूखे हम बहुत लेकिन तुम्हारे एक बोसे के ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 859 - दुश्मन की है तारीफ़

Image
मेरी हर तक्लीफ़ हर मुश्किल का यारों यक-ब-यक _ उसने मेरे सामने हल चुटकियों में धर दिया ॥ आज उस दुश्मन की है तारीफ़ का मंशा बहुत , काम जिसने आज जानी दोस्त वाला कर दिया ॥ थी बहुत जिददो जहद थी कशमकश मैं क्या करूँ ? सोचता रहता था बस ; फाँसी चढ़ूँ या कट मरूँ ? जानता था ख़ुदकुशी करना है मुझको इसलिए ; उसने आकर मेरे मुँह में जह्र लाकर भर दिया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 216 - काश कोई कमाल हो जाए ॥

Image
काश कोई कमाल हो जाए ॥ अम्न दिल में बहाल हो जाए ॥ गर वो सबके जवाब देता है ; एक मेरा सवाल हो जाए ॥ जब नहीं खोदने को कुछ होता ; नख ही मेरा कुदाल हो जाए ॥ कम से कम ग़म में वाइज़ों को भी ; बादानोशी हलाल हो जाए ॥ ख़ुद को भी वो मिटा के रख दे गर ; सिर्फ़ ग़ुस्से से लाल हो जाए ॥ उसके जाते ही एक बिन माँ के ; मेरा बच्चे सा हाल हो जाए ॥ ज़ोरावर हैं वो कछुए जो सोचें ; उनकी चीते सी चाल हो जाए ॥ इक कमाल इस तरह भी हो मेरा ; तीर ही मेरी ढाल हो जाए ॥ है ये हसरत तमाम बोसों की ; उनको तू होंठ-गाल हो जाए ॥ इस तरह से मरूँ कि दुनिया में ; मेरा मरना मिसाल हो जाए ॥ अपने कुछ सोचते हैं अपनों का ; कैसे जीना मुहाल हो जाए ॥ बच भी सकता है वो अगर उसकी ; प्यार से देखभाल हो जाए ॥ झूल लेना तुम उसपे जी भर कर ; जब वो टहनी से डाल हो जाए ॥

*मुक्त-ग़ज़ल : 215 - दे सका ना खिलौने

Image
दे सका ना खिलौने रे बच्चों को मैं ॥ अपने नन्हें खिलौनों से बच्चों को मैं ॥ चाहता था कि दूँ चाँद – तारे उन्हें , हाय ! बस दे सका ढेले बच्चों को मैं ॥ माँगते थे वो रोटी तो देता रहा , मन के लड्डू सदा भूखे बच्चों को मैं ॥ पीटता था बुरों को कोई ग़म नहीं , डाँटता क्यों रहा अच्छे बच्चों को मैं ? सोचता था कि बच्चे हरिश्चन्द्र हों , मानता सच रहा झूठे बच्चों को मैं ॥ इक पिता था समझता रहा फूल ही , धुर नुकीले , कड़े , पैने बच्चों को मैं ॥ रो दिया देखकर पेट को पालने , ईंट – गारे को सर ढोते बच्चों को मैं ॥ घर चलाते हैं बचपन से ही बन बड़े , बाप बोला करूँ ऐसे बच्चों को मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 214 - हैं अभी दीपक

Image
हैं अभी दीपक ; कभी तो आफ़्ताब होंगे ॥ गर नहीं हम आज तो कल कामयाब होंगे ॥ दुरदुराओ मत हमें काग़ज़ के फूलों सा ; देखना इक दिन हमीं अर्क़े गुलाब होंगे ॥ आज तक तो आबे ज़मज़म हैं मगर शायद ; आपकी सुह्बत में हम कल तक शराब होंगे ॥ आज हम फाँकें चने तो तश्तरी में कल ; क्या ज़रूरी है  नहीं शामी कबाब होंगे ? भेड़िये जो खोल में रहते हैं गायों के ; इक न इक दिन देखना ख़ुद बेनक़ाब होंगे ॥ आज कोई भी नहीं फ़न का हमारे पर ; एक दिन मद्दाह सब आली जनाब होंगे ॥  ( आफ़्ताब=सूर्य / दुरदुराना=उपेक्षा करना / आबे ज़मज़म=पवित्र जल / सुह्बत=संगति / मद्दाह=प्रशंसक ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति