*मुक्त-मुक्तक : 795 - थमती न थीं




थमती न थीं इक ठौर पे रहती थीं जो चंचल ॥
नदियों सी जो इठलाती चला करती थीं कलकल ॥
क्या हो गया गहरी भरी-भरी वो झील सी ,
बनकर के रह गईं हैं आँखें थार मरुस्थल ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Comments

Dilbag Virk said…
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-12-2015 को चर्चा मंच पर अलविदा - 2015 { चर्चा - 2207 } में दिया जाएगा । नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाओं के साथ
धन्यवाद
बेहतरीन और उम्दा प्रस्तुति....आपको सपरिवार नववर्ष की शुभकामनाएं...HAPPY NEW YEAR 2016...
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