*मुक्त-मुक्तक : 791 - जंगलों में परिंदे......




कि जंगलों में परिंदे व जानवर देखे ॥
नदी में मछलियाँ , तालाब में मगर देखे ॥
जो निकले ढूँढने को तेरे शह्र में इंसाँ ,
दरिंदे हर कहीं , कहीं नहीं बशर देखे ॥
( शह्र =नगर ,बशर=इंसान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म