*मुक्त-मुक्तक : 789 - दुश्मन दो मुझको



दुश्मन दो मुझको जानी या जानी फिर बलम दो ॥
जज़्बात दिखाने कुछ खुशियाँ या कुछ अलम दो ॥
पानी पे कैसे मुमकिन कुछ भी उकेरना हो ?
इक मुझको कोरा काग़ज़ ,अच्छी सी इक कलम दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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