*मुक्त-मुक्तक : 787 - नहीं कोई मेरा अपना




ख़ुद पे ख़ुद का दिल तहेदिल से लुटाता हूँ ॥
ख़ुद को ख़ुद के ही गले कसकर लगाता हूँ ॥
क्योंकि बनता ही नहीं कोई मेरा अपना ,
ख़ुद को ख़ुद का आईना तक मैं बनाता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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