*मुक्त-ग़ज़ल : 176 - कुत्तों को गोश्त ताज़ा



क्या ख़ूब अंधे-बहरे दुनिया चला रहे हैं ?
हक़दार जो सज़ा के इनआम पा रहे हैं ॥
जलती हुई ज़मीं पर साया न अपना करते ,
बादल समंदरों पे जा-जा के छा रहे हैं ॥
है पेश तश्तरी में कुत्तों को गोश्त ताज़ा ,
मुफ़्लिस उठा के जूठन घूड़े से खा रहे हैं ॥
ये किस तरह के पहरेदारों को रख रहे हो ,
जो चोर-डाकुओं को अपना बता रहे हैं ?
दर पे लगा के ताला चल देते हैं कहीं वो ,
गर जान जाएँ मेहमाँ घर उनके आ रहे हैं ॥
बेखौफ़ धीरे-धीरे कुछ दोस्त दोस्त के ही ,
बैठक से सोने वाले कमरे में जा रहे हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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