*मुक्त-ग़ज़ल : 175 - सवार हम रहे ॥



उजड़े–उजड़े रहे कब बहार हम रहे ?
इसलिए हम न गुल सिर्फ़ ख़ार हम रहे ॥
तुम कुम्हार हो के भी ज़र के ज़ेवर रहे ,
बनके माटी के लौंदे सुनार हम रहे ॥
ख़ुद पे भी एतबार अब हमें सच नहीं ,
इतने धोखाधड़ी के शिकार हम रहे ॥
मक़बरा भी हो तो क्या है तुम ताज हो ,
हो के मस्जिद भी उजड़ी मज़ार हम रहे ॥
तुम हवाई जहाजों पे उड़ते चले ,
रात–दिन बस गधों पे सवार हम रहे ॥
तुम रहे खुशनसीबी से मंज़िल सदा ,
अपनी कमबख़्ती से रहगुज़ार हम रहे ॥
(गुल=पुष्प ,ख़ार=काँटा ,ज़र=स्वर्ण ,ज़ेवर=आभूषण ,एतबार=विश्वास ,कमबख़्ती=दुर्भाग्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Dilbag Virk said…
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-12-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2200 में दिया जाएगा
धन्यवाद

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