*मुक्त-ग़ज़ल : 174 - आरक्त द्रव माहुर है तू ॥




मेरे प्रति निर्मम है अति निष्ठुर है तू ॥
शत्रुओं से प्रेम को आतुर है तू ॥
आदमी सा तू कभी चलता नहीं ,
साँप है या फिर कोई दादुर है तू ?
जब पड़े तू पंखुड़ी पर दे कुचल ,
ओस है या साँड़नी का खुर है तू ॥
चाहता कोई भी न सुनना तुझे ,
काक-वाणी है या खर का सुर है तू ॥
माँग का मत स्वयं को सिंदूर कह ,
पाँव का आरक्त द्रव माहुर है तू ॥
हथकड़ी या पाँव की बेड़ी है रे ,
तू न मंगलसूत्र है ना दुर है तू ॥
और सब बातों में तू कच्चा बड़ा ,
किन्तु अपने निर्णयों में धुर है तू ॥
( दादुर=मेंढक ,खुर=चौपायों के पाँव के निचले भाग का खोल या नाखून ,खर=गधा ,माहुर=आलता ,दुर=नाक या कान की मोती युक्त लटकन ,धुर=पक्का )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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