*मुक्त-ग़ज़ल : 173 - रंगीन नहीं होगा ॥

आकर्षण तुझसा चुम्बक में भी न कहीं होगा ॥
सौन्दर्य तेरे आगे आसीन नहीं होगा ॥
आँखों को भाने वाले इतने रँग हैं तुझमें ,
इन्द्रधनुष तुझसे बढ़कर रंगीन नहीं होगा ॥
मीठेपन में तू मधु से मीठी ही निकलेगी ,
तुझसे ज्यादा सागर भी नमकीन नहीं होगा ॥
सीधी-सादी यौवन-गति सर्पों सी झूम उठे ,
तेरे सुर के आगे कोई बीन नहीं होगा ॥
तेरे दर्शन पा सुध-बुध भूल अपनी कौन युवा ,
तेरी प्रीति में अष्ट-प्रहर लवलीन नहीं होगा ?
तेरा निर्धन स्वामी भी मैं धनकुबेर समझूँ ,
तुझसे जो वंचित उससे कोई दीन नहीं होगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

yashoda Agrawal said…
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 22 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
बेहद प्रभावशाली रचना......बहुत बहुत बधाई.....

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