*मुक्त-मुक्तक : 781 - मोहब्बत , इश्क़, मह्वीयत




भले नाकाम लेकिन तह-ए-दिल से करना हर कोशिश ॥
जिसे पाना न हो मुमकिन उसी की पालना ख़्वाहिश ॥
इसे तुम चाहे जो समझो मोहब्बत , इश्क़, मह्वीयत ,
मेरी नज़रों में है ये ख़ुद की ख़ुद से बेतरह रंजिश ॥
( ख़्वाहिश =इच्छा ,मोहब्बत , इश्क़ =प्रेम,प्यार ,मह्वीयत = आसक्ति ,रंजिश= बैर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



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