*मुक्त-मुक्तक : 780 - मुँह में रसगुल्ला

घी तला पापड़ भी मोटी गोल लिट्टी सा लगे ॥
मुँह में रसगुल्ला रखूँ तो सख़्त गिट्टी सा लगे ॥
उसको ले आओ मुझे फिर ख़ाक ज़र हो जाएगी ,
वरना उसके बिन मुझे सोना भी मिट्टी सा लगे ॥
( लिट्टी = एक तरह की बाटी जैसी मोटी रोटी , गिट्टी = पत्थर का टुकड़ा , ख़ाक = मिट्टी , ज़र = सोना )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक