*मुक्त-मुक्तक : 779 - मोहब्बत का मज़ा ?

इक अजब ढंग से देने की होगी उसकी रज़ा ॥
उसको इक सख़्त-खौफ़नाक मगर ख़ुफ़्या-सज़ा ॥
वरना क्या बात है इक क़ाबिले कराहत को –
वो सरेआम बख़्शता है मोहब्बत का मज़ा ?
( रज़ा=इच्छा ,ख़ुफ़्या=रहस्यमय ,कराहत=घृणा )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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