*मुक्त-मुक्तक : 777 - लरजती है पूरी फ़ौज ॥


 खा-खा के ज़ख्म पगला मनाता फिरे है मौज ॥
उस एक अकेले से लरजती है पूरी फ़ौज ॥
आँखों से उसकी एक टपकती कभी न बूँद ,
रोये तो आँसुओं से लबालब वो भर दे हौज ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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