नवगीत : 39 - चिथड़े-चिथड़े, टुकड़े-टुकड़े



पूर्णतः था जिसपे मैं दिन – रात निर्भर ॥
आज अचानक दिल के दौरे से गया मर ॥
उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ?
माँगता था उससे मैं जब कुछ कि यह दो ।
जितना जी चाहे वो कहता था उठा लो ।
मेरे मुश्किल से भी मुश्किल सारे मसले ,
चुटकियों में हँस के कर देता था हल वो ।
अब कहाँ जाऊँ मैं अपने दुखड़े लेकर ?
दिल के चिथड़े-चिथड़े, टुकड़े-टुकड़े लेकर ?
उसके बिन आँधी में पत्ते सा जैसा डोलूँ ॥
उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ?
क्या था वो मेरे लिए कैसे कहूँ मैं ?
उसका मरना कैसे बिन रोए सहूँ मैं ?
मैं अगर मछली था तो वो मेरा जल था ,
बन गया वह वाष्प अब कैसे रहूँ मैं ?
चाल था वह मेरी मैं तो पाँव भर था ।
मूल था वह मैं तो उसकी छाँव भर था ।
वो ख़ुदा था मेरा किसपे राज़ खोलूँ ?
उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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