172 : मुक्त-ग़ज़ल - क़ातिल से मिलते हैं !!



सारे ही मुसाफ़िर कहाँ मंज़िल से मिलते हैं ॥
कब सब सफ़ीने वक़्त पे साहिल से मिलते हैं ?
मिलने को तो मिलते हैं लोग – बाग गले लग
या हाथ मिलाते हैं कहाँ दिल से मिलते हैं ?
अनचाहों से होती हैं मुलाक़ातें रोज़ ही –
तुझ जैसे इस ज़माने में मुश्किल से मिलते हैं ॥
दुनिया में हमसा अक़्लमंद कौन है मगर ,
हम अक़्ल के मारों से एक चिल से मिलते हैं ?
हैरान हूँ कि ज़िंदगी की भीख को कुछ लोग ,
फैला के हाथ अपने ही क़ातिल से मिलते हैं !!
सब मरते हैं सूरज की चकाचौंध से मिलने ,
हम टिमटिमाते तारों की झिलमिल से मिलते हैं ॥
( सफ़ीना  = नाव , चिल = मूर्ख )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे