170 : मुक्त-ग़ज़ल - कलाई का कड़ा था वो ॥




नगीने सा मेरे दिल की 
अँगूठी में जड़ा था वो ॥
मेरे माथे की बिंदी था ,
कलाई का कड़ा था वो ॥
ज़माने की निगाहों में 
वो बेशक़ एक टीला था ,
मेरी नज़रों में सच ऊँचे 
हिमालय से बड़ा था वो ॥
उसूल अपने भी सारे 
तोड़कर मेरे उसूलों को -
बचाने के लिए सारे 
ज़माने से लड़ा था वो ॥
ज़रा सा मुँह से क्या निकला 
कि मुझ पर कौन जाँ देगा  ?
हथेली पर लिए जाँ अपनी 
झट आगे बढ़ा था वो ॥
मेरा ग़म भूलने हद तोड़कर 
पी-पी के उस दिन सच ,
नहीं सुधबुध भुलाकर बल्कि 
जाँ खोकर पड़ा था वो ॥
नहीं पहुँचा वहाँ जब तक 
उसी जा एक मुद्दत तक ,
मेरे वादे पे मिलने के 
किसी बुत सा खड़ा था वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

yashoda Agrawal said…
दीप पर्व की शुभकामनाएँ ..आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 13 नवम्बबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
धन्यवाद । यशोदा अग्रवाल जी ।

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