169 : मुक्त-ग़ज़ल - मुबारक़बाद


कोई भी तूने न की ईजाद बढ़चढ़  ॥
क्यों करे दुनिया तुझे फिर याद बढ़चढ़ ?
ऐसा कुछ कर दुश्मनों को भी ख़ुद आकर ,
देना पड़ जाए मुबारक़बाद बढ़चढ़  ॥
मिट गया था अपने ही हाथों तो अब ख़ुद ,
कर रहा है ख़ुद को वो आबाद बढ़चढ़  ॥
है नहीं जितना वो दिखलाता है अक्सर ,
दुश्मनों को यह कि है वो शाद बढ़चढ़  ॥
उस हवा जैसे परिंदे के लिए क्यों ,
जाल बुनता है अरे सय्याद बढ़चढ़  ?
कोई साज़िश ,कोई ख़ुदगरज़ी है वरना ,
मुझको क्यों दे मेरा हामिज़ दाद बढ़चढ़  ?
( ईजाद=आविष्कार , शाद=प्रसन्न , सय्याद=शिकारी , हामिज़=निंदक , दाद=प्रशंसा  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे