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Showing posts from November, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 783 - दो ख़बर ॥

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झूठ है , झूठ है , झूठ है हाँ मगर ॥ दोस्तों-दुश्मनों 
सबको कर दो ख़बर ॥ कम से कम मुंतज़िर 
मेरी मैयत के जो , उनसे कह दो कि मैं 
कल गया रात मर ॥ ( मुंतज़िर = प्रतीक्षारत , मैयत = मृत्यु ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 40 - अलाव नहीं है ॥

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चाहे धरा पे चाहे चाँद पे या अधर पर ॥ जो चाहते हैं वह न लाके दोगे तुम अगर ॥ तुम लाख कहो तुमको हमसे प्यार है मगर , हम समझेंगे हमसे तुम्हें लगाव नहीं है ॥ सिंगारहीन हमको देखकर अगर तुम्हें – ऐसा लगे न सामने है कोई अप्सरा । सजधज के आएँ तो लगे न दिल की धड़कनें – थम सी गई हैं या तुरंत बढ़ गईं ज़रा । हम मान लेंगे हममें सुंदराई तो है पर , टुक चुम्बकत्व या तनिक खिंचाव नहीं है ॥ छू भर दें हम अगर तुम्हें तो तुमको न लगे – बहने लगी नसों में ख़ून की जगह पे आग । धर दें अधर अधर पे फिर भी तुममें रंच भी –

*मुक्त-मुक्तक : 782 - चने नहीं चबाना है ॥

लाल मिर्ची औ’ बस चने नहीं चबाना है ॥ सोने – चाँदी के पेट भरके कौर खाना है ॥ आज रहता हूँ मैं फ़ुटपाथ पे कल मुझको मगर , रहने को घर नहीं ब ख़ुदा महल बनाना है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति



*मुक्त-मुक्तक : 781 - मोहब्बत , इश्क़, मह्वीयत

भले नाकाम लेकिन तह-ए-दिल से करना हर कोशिश ॥ जिसे पाना न हो मुमकिन उसी की पालना ख़्वाहिश ॥ इसे तुम चाहे जो समझो मोहब्बत , इश्क़, मह्वीयत , मेरी नज़रों में है ये ख़ुद की ख़ुद से बेतरह रंजिश ॥ ( ख़्वाहिश =इच्छा ,मोहब्बत , इश्क़ =प्रेम,प्यार ,मह्वीयत = आसक्ति ,रंजिश= बैर ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति


172 : ग़ज़ल - क़ातिल से मिलते हैं !!

मुसाफ़िर सारे के सारे कहाँ मंज़िल से मिलते हैं ? सफ़ीने सब के सब कब वक़्त पे साहिल से मिलते हैं ? मिला करते हैं लग-लग के गले भी लोग और कस-कस , मिलाते हाथ भी हैं सच मगर कब दिल से मिलते हैं ?
मुलाक़ातें तो अनचाहों से बारंबार हों अपनी , ज़माने में कभी तुमसे बहुत मुश्किल से मिलते हैं ।। न होगा हमसा कोई दूसरा अहमक़ ख़ुदाई में , मिलें दानिशवरों से सब हमीं बस चिल से मिलते हैं ।। बहुत हैरान हूँ मैं ज़िंदगी की भीख को मुर्दे , बढ़ाकर हाथ-बाँँहें अपने ही क़ातिल से मिलते हैं !! मरा करते हैं सब सूरज के चुँधियाते उजालों को , हमीं इक टिमटिमाते तारों की झिलमिल से मिलते हैं ॥ ( ख़ुदाई =संसार ; अहमक़ =मूर्ख ;दानिशवर =ज्ञानी ; सफ़ीना =नाव ; चिल =मूर्ख ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 39 - चिथड़े-चिथड़े, टुकड़े-टुकड़े

पूर्णतः था जिसपे मैं दिन – रात निर्भर ॥ आज अचानक दिल के दौरे से गया मर ॥ उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ? माँगता था उससे मैं जब कुछ कि यह दो । जितना जी चाहे वो कहता था उठा लो । मेरे मुश्किल से भी मुश्किल सारे मसले , चुटकियों में हँस के कर देता था हल वो । अब कहाँ जाऊँ मैं अपने दुखड़े लेकर ? दिल के चिथड़े-चिथड़े, टुकड़े-टुकड़े लेकर ? उसके बिन आँधी में पत्ते सा जैसा डोलूँ ॥ उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ? क्या था वो मेरे लिए कैसे कहूँ मैं ? उसका मरना कैसे बिन रोए सहूँ मैं ? मैं अगर मछली था तो वो मेरा जल था ,

*मुक्त-मुक्तक : 780 - मुँह में रसगुल्ला

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घी तला पापड़ भी मोटी गोल लिट्टी सा लगे ॥ मुँह में रसगुल्ला रखूँ तो सख़्त गिट्टी सा लगे ॥ उसको ले आओ मुझे फिर ख़ाक ज़र हो जाएगी , वरना उसके बिन मुझे सोना भी मिट्टी सा लगे ॥ ( लिट्टी = एक तरह की बाटी जैसी मोटी रोटी , गिट्टी = पत्थर का टुकड़ा , ख़ाक = मिट्टी , ज़र = सोना ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

171 : ग़ज़ल - गोल चकरी ॥

तेरे आगे क्या मेरी औकात ठहरी  ? राजधानी तू मैं इक क़स्बा या नगरी ॥ यों तो हूँ मैं जिराफ़ सा पर तेरे आगे , सामने ज्यों ऊँट के बैठी हो बकरी !! तेरे मेरे रंग में बस फ़र्क़ इतना , एक काला काग दूजा मृग सुनहरी !! तेरे चक्कर काटती फिरती है दुनिया , मैं हवा से फरफराती गोल चकरी ॥ मुझसे मत मरु की तृषा तू कह बुझाने , चुल्लू भर पानी मैं तू इक झील गहरी ॥ क्या तुझे ललकार कर मरना मुझे है  ? तू पहलवान और मैं कृशकाय-ठठरी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

170 : ग़ज़ल - कलाई का कड़ा था वो ॥

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नगीने सा मेरे दिल की अँगूठी में जड़ा था वो ॥ मेरे माथे की बिंदी था ,कलाई का कड़ा था वो ॥ ज़माने की निगाहों में वो बेशक़ एक टीला था , मेरी नज़रों में सच ऊँचे हिमालय से बड़ा था वो ॥ उसूल अपने भी सारे तोड़कर मेरे उसूलों को - बचाने के लिए सारे ज़माने से लड़ा था वो ॥ ज़रा सा मुँह से क्या निकला कि मुझ पर कौन जाँ देगा  ? हथेली पर लिए जाँ अपनी झट आगे बढ़ा था वो ॥ मेरा ग़म भूलने हद तोड़कर पी-पी के उस दिन सच , नहीं सुधबुध भुलाकर बल्कि जाँ खोकर पड़ा था वो ॥ नहीं पहुँचा वहाँ जब तक उसी जा एक मुद्दत तक , मेरे वादे पे मिलने के किसी बुत सा खड़ा था वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : दीपावली ॥

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पैर धरती पे देखो रखे बिन चली ॥ दुनिया सारी मनाने को दीपावली ॥ कानफोड़ू पटाखों की चहूँदिस धमक । जलती बारूद की सूर्य जैसी चमक । बूढ़े , शिशु और बीमार इस शोर से , जब दहलते हैं भीतर से उठते बमक । पूछते हैं धमाकों का औचित्य वो – जो मचा देता है शांति में खलबली ? पैर धरती पे देखो रखे बिन चली ॥ दुनिया सारी मनाने को दीपावली ॥ तेल खाने नहीं पर जलाने बहुत । ज़ीरो पढ़ने नहीं जगमगाने बहुत । सौ के बदले जलाओ दिया एक ही , बल्ब इक रोशनी में नहाने बहुत । सोचना फिर तुम्हीं तेल कितना बचा ? एक ही रात में कितनी बिजली जली ? पैर धरती पे देखो रखे बिन चली ॥ दुनिया सारी मनाने को दीपावली ॥ ( ज़ीरो = ज़ीरो बल्ब , बमक = चौंक पड़ना , सहम जाना )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

169 : ग़ज़ल - मुबारक़बाद

कोई भी तूने न की ईजाद बढ़चढ़  ॥ क्यों करे दुनिया तुझे फिर याद बढ़चढ़ ? ऐसा कुछ कर दुश्मनों को भी ख़ुद आकर , देना पड़ जाए मुबारक़बाद बढ़चढ़  ॥ मिट गया था अपने ही हाथों तो अब ख़ुद , कर रहा है ख़ुद को वो आबाद बढ़चढ़  ॥ है नहीं जितना वो दिखलाता है अक़्सर , दुश्मनों को यह कि है वो शाद बढ़चढ़  ॥ उस हवा जैसे परिंदे के लिए क्यों , जाल बुनता है अरे सय्याद बढ़चढ़  ? कोई साज़िश ,कोई ख़ुदग़रज़ी है वर्ना , मुझको क्यों दे मेरा हामिज़ दाद बढ़चढ़  ? ( ईजाद=आविष्कार , शाद=प्रसन्न , सय्याद=शिकारी , हामिज़=निंदक , दाद=प्रशंसा  ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

168 : ग़ज़ल : गाय का बछड़ा न कहो ॥

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ज़रा सी बाढ़ को तुम यों ही ज़लज़ला न कहो ॥ दिये की लौ है इसे सूर्य-चंद्रमा न कहो ॥ जो जी में आए ख़ुशामद में याद करके कहें , मगर हाँ भूल के नाली को नर्मदा न कहो ॥ न पहुँचे लाख वो मंज़िल पे पर चला जो चले , उसे कभी भी पड़ा , ठहरा या खड़ा न कहो ॥ अभी वो शेर का शावक है दंतहीन मगर , गले लगा के उसे गाय का बछड़ा न कहो ॥ ये माना कब से वो खटिया पे शव के जैसा पड़ा , कि साँस चलती है जब तक उसे मरा न कहो ॥ ज़माना जिसको कि इक सुर में कह रहा हो भला , भले बुरा हो वो पर उसको तुम बुरा न कहो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति