*मुक्त-मुक्तक : 774 - राह के क़ालीन

आशिक़ो-महबूब भी फटके न फिर उसके क़रीब ॥
हो गया जब शाह से वह माँगता-फिरता ग़रीब ॥
जो हुआ करते थे उसकी राह के क़ालीन सब ,
वक़्ते-आख़िर पास में उसके न दिक्खे वो हबीब ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म