*मुक्त-मुक्तक : 771 - लबालब ग़ुरूर था ॥

सच था कि झूठ इसपे
ग़ुमाँ तो ज़ुरूर था ॥
मेरा है तू ये मुझमें
लबालब ग़ुरूर था ॥
आँखें खुलीं तो आस्माँ से
औंधा गिर पड़ा ,
खाली हुआ जो मुझमें
छलकता सुरूर था ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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