*मुक्त-मुक्तक : 770 - चमचम अमीराना ॥

दरो-दीवार चाँदी की हों ,छत सोने मढ़ी माना ॥
भले रिसता हो कोने-कोने से चमचम अमीराना ॥
जहाँ के सुन लतीफ़े ,मसख़रे तक कर भी बाशिंदे -
नहीं हँसते , उसे मैं घर नहीं ; बोलूँ अज़ाख़ाना ॥
( अमीराना=धनाढ्यता ,लतीफ़े=चुट्कुले ,मसख़रे=विदूषक ,तक=देख ,बाशिंदे=निवासी ,अज़ाख़ाना=शोक गृह )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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