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Showing posts from October, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 776 - दलदल में धँस रहा ॥

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वो जानबूझ कर के ही दलदल में धँस रहा ॥ मर्ज़ी से अपनी काँटों के जंगल में फँस रहा ॥ इस धँसने और फँसने से होगा उसे ज़रूर - कुछ फ़ायदा तभी तो दर्द में भी हँस रहा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 775 - चूहे की दुम

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कर दोगे मुँह से शेर के चूहे की दुम उसे ॥ होशो - हवास लूट के कर दोगे गुम उसे ॥ इक बार ही बस सिर्फ़ोसिर्फ़ एक बार ही , बेपर्दा अपना हुस्न अगर दिखा दो तुम उसे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत : 38 - सुए से फोड़ लें आँखें ?

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जो पढ़ना चाहते हैं वैसा क्यों लिखता नहीं कोई ? जो तकना चाहते हैं वैसा क्यों दिखता नहीं कोई ? कि पढ़ना छोड़ ही दें या सुए से फोड़ लें आँखें ? कोई अपनों में दिखता ही नहीं मन मोहने वाला , कोई मिलता नहीं पूरा हृदय को सोहने वाला , करें क्या शत्रु को मन भेंट दे दें , जोड़ लें आँखें ? नहीं लगता असाधारण हमें क्यों उसका अब व्यक्तित्व ? कड़ा संघर्ष कर जिस पर स्थापित कल किया स्वामित्व , दरस को जिसके मरते थे लगे अब मोड़ लें आँखें ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 774 - राह के क़ालीन

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आशिक़ो-महबूब भी फटके न फिर उसके क़रीब ॥ हो गया जब शाह से वह माँगता-फिरता ग़रीब ॥ जो हुआ करते थे उसकी राह के क़ालीन सब , वक़्ते-आख़िर पास में उसके न दिक्खे वो हबीब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 773 - साफ़-सुथरे ख़्वाब

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सुधारता रहूँगा भूल पर मैं भूल अपनी ॥ न पड़ने दूँगा आँख में घुमड़ती धूल अपनी ॥ रखूँगा साफ़-सुथरे ख़्वाब हमेशा ज़िंदा , न होने दूँगा तमन्ना कभी फिज़ूल अपनी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 772 - अति लघुकथा

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इक कविता महाकाव्य अनायास बन गई ॥ अति लघुकथा वृहदतर उपन्यास बन गई ॥ इच्छा तो सत्य तृप्ति की थी एक बूँद से , करता क्या जब तृषा ही मृग की प्यास बन गई ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 771 - लबालब ग़ुरूर था ॥

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सच था कि झूठ इसपे ग़ुमाँ तो ज़ुरूर था ॥ मेरा है तू ये मुझमें लबालब ग़ुरूर था ॥ आँखें खुलीं तो आस्माँ से औंधा गिर पड़ा, खाली हुआ जो मुझमें छलकता सुरूर था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 770 - चमचम अमीराना ॥

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दरो-दीवार चाँदी की हों ,छत सोने मढ़ी माना ॥ भले रिसता हो कोने-कोने से चमचम अमीराना ॥ जहाँ के सुन लतीफ़े ,मसख़रे तक कर भी बाशिंदे - नहीं हँसते , उसे मैं घर नहीं ; बोलूँ अज़ाख़ाना ॥ ( अमीराना=धनाढ्यता ,लतीफ़े=चुट्कुले ,मसख़रे=विदूषक ,तक=देख ,बाशिंदे=निवासी ,अज़ाख़ाना=शोक गृह ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 769 - ज़िंदगी काफ़ूर सी.....

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आस्माँ से गोल पत्थर जैसी गिरती है ॥ फ़र्श पर बोतल के टुकड़ों सी बिखरती है ॥ पूछते हो तो सुनो सच आजकल अपनी – ज़िंदगी काफ़ूर सी उड़ती गुजरती है ॥ ( काफ़ूर = कपूर ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 768 - अब तो लाज़िम है.....

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सर्द तनहाई से क्या गर्मागर्म महफ़िल से ॥ क्या तलातुम से और क्या पुरसुकून साहिल से ॥ अब तो लाज़िम है , नागुज़ीर है , ज़रूरी है – घर से क्या तुझको अभी मैं निकाल दूँ दिल से ॥ ( सर्द तनहाई=ठंडा एकान्त ,महफ़िल=सभा ,तलातुम=बाढ़ ,पुरसुकून साहिल=शांत किनारा , लाज़िम,नागुज़ीर,ज़रूरी=अनिवार्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति