*मुक्त-मुक्तक : 762 - कच्चा चबा के मारा ॥

जिस वक़्त को बचाने
की मैंने की क़वाइद,
उसने ही मुझको कसके
गर्दन दबा के मारा ॥
जिसको बचा के जबड़े
से मैं मगर के लाया,
उसने चने सा मुझको
कच्चा चबा के मारा ॥
तक़्दीर में ही मेरी
थी इस क़दर ख़राबी,
हैराँ तो होगे सुनकर
लेकिन ये सच है मुझको-
मरते हैं लोग जिसको
साँसों में भरने अपनी,
उस जाँफिज़ा सुबह
की बादे सबा ने मारा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म