*मुक्त-मुक्तक : 767 - चीते को हरा दूँ ॥

तेरे लिए निचोड़कर मैं रेत बता दूँ ॥
तू कह तो ठंडा पानी चुटकियों में जला दूँ ॥
तू आज भी हो जाए मेरी तो मैं क़सम से ,
लँगड़ा हूँ मगर दौड़ में चीते को हरा दूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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