*मुक्तक : 764 - ज़िंदगी करती रही....




[चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

ज़िंदगी करती रही अपनी फ़ज़ीहत रोज़ ही ॥
और हम लेते रहे उससे नसीहत रोज़ ही ॥
रोज़ ही फँसते रहे हम हादसों में और फिर ,
शर्तिया होती रही उनसे फ़राग़त रोज़ ही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



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