Monday, September 28, 2015

मुक्तक : 767 - हिरन को हरा दूँ ॥



तेरे लिए निचोड़ तप्त रेत बता दूँ ॥
तू कह तो बर्फ जल को लंक जस ही जला दूँ ॥
हो जाए आज भी तू मेरी तो मैं क़सम से ,
लँगड़ा हूँ फिर भी दौड़कर हिरन को हरा दूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, September 25, 2015

मुक्तक : 766 ( B ) अब पस्त हो बैठे ?



तेरे भी बाक़ी बचे सब पस्त हो बैठे ॥
मेरे तो मत पूछ तू कब पस्त हो बैठे ?
जो बँधाते थे हमें हिम्मत ये हैरत है
उनके भी सब हौसले अब पस्त हो बैठे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, September 21, 2015

मुक्तक : 766 - छुरी वो निकली ॥



सचमुच बहुत बुरी वो , निकली तो अब करें क्या ?
जल नाँँह माधुरी वो , निकली तो अब करें क्या ?
सोचा था पुष्प कोमल , कोमल है वो अरे पर ,
काँटा , छुरा , छुरी वो , निकली तो अब करें क्या ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, September 17, 2015

मुक्तक : 765 - वो क्या मुझे जगाएगा ?



वो क्या मुझे जगाएगा जो ख़ुद ही सो रहा ?
वो क्या मुझे हँसाएगा जो ख़ुद ही रो रहा ?
हिम्मत-ओ-हौसला वो क्या दिलाएगा मुझे ,
जो ख़ुद हिरास में है लस्त-पस्त हो रहा ?
( हिरास = निराशा , आशंका )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, September 16, 2015

मुक्तक : 764 - ज़िंदगी करती रही





[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

ज़िंदगी करती रही अपनी फ़ज़ीहत रोज़ ही ॥
और हम लेते रहे उससे नसीहत रोज़ ही ॥
रोज़ ही फँसते रहे हम हादसों में और फिर ,
शर्तिया होती रही उनसे फ़राग़त रोज़ ही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



Thursday, September 10, 2015

मुक्तक : 763 - एक ही मक़सद




ज़िंदगी का एक ही मक़सद रखा ले लूँ मज़ा ॥
जिस तरह भी बन पड़े कर लूँ हर इक पूरी रज़ा ॥
लेकिन इस तक़्दीर ने भी ठान रक्खी थी अरे ,
वो इनामों की जगह देती रही चुन-चुन सज़ा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति




Monday, September 7, 2015

मुक्तक : 762 - कच्चा चबाने मारा ॥


             
जिस वक़्त को बचाने की मैंने की क़वाइद,
उसने मुझे लिपटकर गर्दन दबाने मारा ।
जिसको बचा के जबड़े से मैं मगर के लाया ,
उसने मुझे चने सा कच्चा चबाने मारा ।।
तक़्दीर में ही मेरी थी इस क़दर ख़राबी ,
हैराँ तो होगे सुनकर लेकिन ये सच है मुझको,
मरते हैं लोग जिसको साँसों में भरने अपनी ,
उस सुब्हे जाँफ़िज़ा की बादे सबा ने मारा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, September 4, 2015

मुक्तक : 761 - अर्श को पाना ॥



[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]
आपको जानके , होता न शम्अ ; पर्वाना ॥
इश्क़ में आपके , होता न मैं जो दीवाना ॥
दफ़्न रहके भी मैं , रह लेता फ़र्श पर भी ख़ुश ,
मुझको होता कभी , लाज़िम न अर्श को पाना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, September 2, 2015

मुक्तक : 760 - तुझे बेदख़्ल कर दूँ





चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

मुनासिब है हटा दूँ तुझको अपने जेह्न से , दिल से ।।
तुझे बेदख़्ल कर दूँ अपनी तनहाई से , महफ़िल से ।।
इसी में अक़्लमंदी है अगर है सिर्फ़ नुक़्साँ ही ,
ज़माने भर से लेकर दुश्मनी इक तेरे हासिल से ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...