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Showing posts from September, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 767 - चीते को हरा दूँ ॥

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तेरे लिए निचोड़कर मैं रेत बता दूँ ॥ तू कह तो ठंडा पानी चुटकियों में जला दूँ ॥ तू आज भी हो जाए मेरी तो मैं क़सम से , लँगड़ा हूँ मगर दौड़ में चीते को हरा दूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : अब पस्त हो बैठे ?

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तेरे भी बाक़ी बचे सब पस्त हो बैठे ॥ मेरे तो मत पूछ तू कब पस्त हो बैठे ? जो बँधाते थे हमें हिम्मत ये हैरत है – उनके भी सब हौसले अब पस्त हो बैठे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 766 - छुरी वो निकली ॥

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सचमुच बहुत बुरी वो निकली ॥ नीर नहीं माधुरी वो निकली ॥ सोचा था इक नर्म फूल है , काँटा, कील, छुरी वो निकली ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 765 - वो क्या मुझे जगाएगा ?

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वो क्या मुझे जगाएगा जो ख़ुद ही सो रहा ? वो क्या मुझे हँसाएगा जो ख़ुद ही रो रहा ? हिम्मत-ओ-हौसला वो क्या दिलाएगा मुझे , जो ख़ुद हिरास में है लस्त-पस्त हो रहा ? ( हिरास = निराशा , आशंका )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्तक : 764 - ज़िंदगी करती रही....

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[चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]
ज़िंदगी करती रही अपनी फ़ज़ीहत रोज़ ही ॥ और हम लेते रहे उससे नसीहत रोज़ ही ॥ रोज़ ही फँसते रहे हम हादसों में और फिर , शर्तिया होती रही उनसे फ़राग़त रोज़ ही ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति


*मुक्त-मुक्तक : 763 - एक ही मक़सद........

ज़िंदगी का एक ही मक़सद रखा ले लूँ मज़ा ॥ जिस तरह भी बन पड़े कर लूँ हर इक पूरी रज़ा ॥ लेकिन इस तक़्दीर ने भी ठान रक्खी थी , वो इनामों की जगह देती रही चुन-चुन सज़ा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति



*मुक्त-मुक्तक : 762 - कच्चा चबा के मारा ॥

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जिस वक़्त को बचाने की मैंने की क़वाइद, उसने ही मुझको कसके गर्दन दबा के मारा ॥ जिसको बचा के जबड़े से मैं मगर के लाया, उसने चने सा मुझको कच्चा चबा के मारा ॥ तक़्दीर में ही मेरी थी इस क़दर ख़राबी, हैराँ तो होगे सुनकर लेकिन ये सच है मुझको- मरते हैं लोग जिसको साँसों में भरने अपनी, उस जाँफिज़ा सुबह की बादे सबा ने मारा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 761 - आस्मान को पाना ॥

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[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]
आपको जानके शम्आ न होता पर्वाना ॥ इश्क़ में आपके होता न मैं जो दीवाना ॥ दफ़्न रहके भी मैं ज़मीन में रह लेता ख़ुश , मुझको लाज़िम न होता आस्मान को पाना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 760 - तुझे बेदख़्ल कर दूँ.......

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[चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]
मुनासिब है हटा दूँ तुझको अपने जेह्न-ओ-दिल से ॥ तुझे बेदख़्ल कर दूँ अपनी तनहाई-ओ-महफ़िल से ॥ इसी में अक़्लमंदी है अगर है सिर्फ़ नुक़्साँ ही , ज़माने भर से लेकर दुश्मनी इक तेरे हासिल से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति