*मुक्त-मुक्तक : 756 - तर-बतर आँखें ?





ढूँढती कुछ इधर-उधर आँखें ॥
लब सिले चीखतीं मगर आँखें ॥
किसको खोया कि एक पत्थर की ,
ख़ुश्क मौसम में तर-बतर आँखें ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति




Comments

Varun Mishra said…
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