कविता : किसलिए जिज्ञासा ?


[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] 

दुश्चरित्र को प्राप्त सौंदर्य
या ब्रह्मचारी की कुरूपता ,
ज्ञानी की निर्धनता
या मूर्ख की अमीरी ,
दुर्बल का आक्रोश
अथवा बलवान का शांतत्व ,
अंधे के हाथ लगने वाली बटेर
या देखते ही देखते आँखों से चोरी हो जाने वाला काजल ,
प्यासों के समक्ष फैले रेगिस्तान
अथवा तृप्तों के आगे पसरी मधुशालाएँ ,
गाय की थाली में मांस
या शेर को परोसी गई घास ,
पंखहीन को आकाश छूने के लक्ष्य
और केंचुए को पृथ्वी नापने का दण्ड ,
न जाने किस अदृश्य के निर्देश पर
किन्तु कहीं न कहीं
घट रहा है नित्य ।
प्रश्न यह कि क्यों ?
प्रश्न यह कि कब तक ?
प्रश्न यह कि क्या यह सब
प्रायोजित अथवा पूर्व निर्धारित है ?
प्रश्न यह कि क्या ये विडंबनाएँ हैं ?
प्रश्न यह कि क्या ये सांयोगिक विरोधाभास हैं ?
प्रश्न यह कि क्या यह पक्षपात है अथवा अन्याय ?
प्रश्न यह कि क्या कोई उपाय मिल सकेगा
इन विसंगतियों को दूर करने का
उक्त तमाम प्रश्नों के सटीक उत्तर मिल जाने के बाद भी ?
यदि नहीं ,
तो फिर कैसा आश्चर्य ?
किसलिए जिज्ञासा ?
जब यही सब चलते रहना है ।
अतः
''दिल के खुश रखने को
ग़ालिब ख़याल अच्छा है'' की तर्ज़ पर
कुछ ठोस उपाय :
साक्षी भाव रखें ।
मशीन हो जाएँ ।
हलाल होता हुआ मुर्गा या बकरा नहीं
कटती हुई भिण्डी अथवा
उबलता हुआ आलू हो जाएँ ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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