*मुक्त-मुक्तक : 759 - संदल बना दो तुम ॥


[ चित्रांकन :डॉ. हीरालाल प्रजापति ]
सुलगता मन-मरुस्थल
इक हरा जंगल बना दो तुम ॥
नुकीली नागफणियाँ
फूलते संदल बना दो तुम ॥
ठिठुरते-काँपते , नंगे-
धड़ंगे मेरे जीवन का ,
तुम्हारा गर्म–ऊनी प्यार
अब कंबल बना दो तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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