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Wednesday, August 26, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 758 - फ़िक्र अगर होती ॥




तुझको मेरे दर्द की सच फ़िक्र अगर होती ॥
ना सही पूरी ज़रा सी ही मगर होती ॥
है अभी तक बेअसर मुझ पर दवा जो वो ,
तू पिलाती तो यक़ीनन कारगर होती ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति




3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (27-08-2015) को "धूल से गंदे नहीं होते फूल" (चर्चा अंक-2080) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Varun Mishra said...

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मन के - मनके said...

तू पिलाती तो असरदार होती
मुक्तक की गोली—असर कर गई.