*मुक्त-मुक्तक : 757 - कोहे नूर था ॥




दिन-रात अपनी आँखों के वो हुजूर था ॥
ना जाने क्यों समझ से बाहर था दूर था ?
कंकड़ ही जान हमने ठुकरा दिया उसे ,
कुछ और वो नहीं था , इक कोहे नूर था ॥
(हुजूर=सामने, कोहे नूर=कोहिनूर हीरा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Comments

Varun Mishra said…
Its such a nice story

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