*मुक्त-मुक्तक : 750 - रो-रो पड़ता हूँ ॥










द्वेष-जलन-ईर्ष्यादि भाव सर ढो-ढो पड़ता हूँ ॥
तनिक उदास ,अति दुखित ,तृषिततर हो-हो पड़ता हूँ ॥
जब विहारता कोई युगल सूने में विहँस पड़ता ,
अपने एकाकी होने पर रो-रो पड़ता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 










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