*मुक्त-मुक्तक : 749 - कपड़े झड़ा के रह गए ॥







कसमसा के तिलमिला के फड़फड़ा के रह गए ॥
लाज से धरती में सर अपना गड़ा के रह गए ॥
स्वप्न निशिदिन जिसको चित करने का तकते थे सदा ,
धूल उससे चाटकर कपड़े झड़ा के रह गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 







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