*मुक्त-मुक्तक : 747 - आम होके रोते हैं ॥




नामवर मुफ़्त में बदनाम होके रोते हैं ॥
वो बहुत ख़ास से अब आम होके रोते हैं ॥
बेवजह दिल से हमारे भी खूँ नहीं रिसता ,
इश्क़ के काम में नाकाम होके रोते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



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