*मुक्त-मुक्तक : 745 - दौड़ पड़ते हैं ॥





कभी हिरण से साथ-साथ दौड़ पड़ते हैं ॥
कभी नवीन अश्व जैसे हठ पे अड़ते हैं ॥
कभी-कभार कुत्ते-बिल्लियों से आपस में ,
दिलो-दिमाग़ ये मेरे झगड़ते-लड़ते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति




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