*मुक्त-मुक्तक : 743 - मेरा सच्चा ख़ैरख़्वाह


[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] 

मुझको कितनी बार गिर जाने पे तूने ही उठाया !!
ख़ुदकुशी करने से मरने से मुझे तूने बचाया !!
हर दफ्आ साबित हुआ तू मेरा सच्चा ख़ैरख़्वाह ,
फिर भी क्यों  ? 'अपना है तू 'इसका यकीं अब तक न आया  !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति   
           

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