*मुक्त-मुक्तक : 738 - तुम मर चुके हो ॥


कुछ ऐसा मेरे दिल पे अपना क़ब्ज़ा कर चुके हो ॥
यूँ ख़्वाबों में , ख़यालों में लबालब भर चुके हो ॥
ज़माना कह रहा है तुम ज़माने में नहीं अब,
यकीं मुझको नहीं आता मगर तुम मर चुके हो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी