*मुक्त-मुक्तक : 737 - बरगद के झाड़ ॥



दुनिया के कैसे - कैसे झाड़ी - झंखाड़ ?
कहलाते शीशम-पीपल-बरगद के झाड़ ॥
करके दूबाकार एक बौनी रचना ,
विज्ञापन में उसको दिखला-दिखला ताड़ !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

कहानी : एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा