*मुक्त-मुक्तक : 736 - आँखें नहीं माँगूँ ?


मुझे लाज़िम न क्यों
कोई शमा ,
क्यों एक भी जुगनूँ ?
क्यों अंधा हो के भी
मैं भीख में
आँखें नहीं माँगूँ ?
तो सुन -
दिन-रात याँ रहती हुक़ूमत
सिर्फ़ अँधेरों की ,
मना है
देखने की बात भी करना ,
न है मौजूँ !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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