*मुक्त-मुक्तक : 732 - तक़दीर से तक़रार से ॥


जीत की हसरत लिए 
हासिल क़रारी हार से,
प्यार के बदले लगाती 
ज़िंदगी की मार से ,
इतना आजिज़ आ चुका हूँ 
मैं कि तौबा दूर ही –
अब तो रहना है मुझे 
तक़दीर से तक़रार से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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