*मुक्त-मुक्तक : 731 - पलँग-खाट वाले ॥


भटकते फिरें राजसी-बाट वाले ॥
ज़मीं पर पड़े हैं पलँग-खाट वाले ॥
बना दी है वो वक़्त ने उनकी हालत ,
रहे अब न घर के न वो घाट वाले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Kavita Rawat said…
तभी तो राजसी ठाट बाट बना रहता है
सटीक

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म