*मुक्त-मुक्तक : 727 - मुझपे पत्थर चला ॥




सबसे छुपकर न सबसे उजागर चला ॥
तू न थपकी न चाँटे सा कसकर चला 
काँच का टिमटिमाता हुआ बल्ब हूँ ,
मत किसी ढंग से मुझपे पत्थर चला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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