*मुक्त-मुक्तक : 726 - सोने में मज़ा आता है ॥


गाह चुपचाप कभी
ढोल बजा आता है ॥
रोज़ ख़्वाबों में वो
भरपूर सजा आता है ॥
नींद का मैं नहीं
ग़ुलाम मगर सच मुझको ,
उसके दीदार को
सोने में मज़ा आता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म