*मुक्त-मुक्तक : 725 - बेशक़ करे न कोई यकीं


इक बार नहीं बल्कि कई बार किया है ॥
यूँ ही नहीं हमेशा यादगार किया है ॥
बेशक़ करे न कोई यकीं मेरी बात पर ,
दुश्मन को मैंने अपने मगर प्यार किया है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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