*मुक्त-मुक्तक : 724 - दो ग़ज़ ज़मीन.........


दो ग़ज़ ज़मीन अपने दफ़्न को क्या माँग ली ?
पैरों तले कि भी ज़मीन उसने खींच ली !!
मेरे ही हक़ को मार के वो शाह हो गया ,
मैं बेतरह पुकारता रहा अली-अली ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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