167 : मुक्त-ग़ज़ल - उसकी ख़िलाफ़त की थी ॥



जिसने मुझसे न लम्हा भर को मोहब्बत की थी ,
उसकी ही मैंने शब-ओ-रोज़ इबादत की थी !!
मेरी बदक़िस्मती की दास्तान क्या कहिए ?
मुझसे अपनों ने सरेआम बग़ावत की थी !!
मानता क्या मैं बुरा दोस्तों की बातों का ?
मैंने भूले न अदू की भी शिकायत की थी !!
एक भी दुनिया में जिसका न तरफ़दार रहा ,
एक मैंने न कभी उसकी ख़िलाफ़त की थी ॥
उसने बख़्शा न मुझे एक भूल पर जिसके ,
मैंने संगीन गुनाहों पे रियायत की थी ॥
आख़िरश वो भी बुरी तरह टूट-फूट गया ,
मैंने जाँ से भी अधिक जिसकी हिफ़ाज़त की थी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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