166 : मुक्त ग़ज़ल - मैं मसखरा लिखूँ ?


हल्दी से पीले तुमको कैसे मैं हरा लिखूँ ?
हो रिक्त तुम तो क्यों तुम्हें भरा-भरा लिखूँ ?
विधिवत् तुम्हारी साँसे चल रही हैं , है पता
कुछ बात है कि तुमको निरंतर मरा लिखूँ !
क्या इसलिए कि तुम प्रगाढ़ मित्र हो मेरे ,
पीतल को भी तुम्हारे मैं कनक खरा लिखूँ ?
उत्साह ,शक्ति ,स्वप्न और त्वरा से हीन जो
यौवन हो ,कैसे मैं उसे नहीं जरा लिखूँ ?
धंधा है जब तुम्हारा रुदन का ,विलाप का ,
सर्कस का कैसे तुमको फिर मैं मसखरा लिखूँ ?
सच बोलने का दृढ़प्रतिज्ञ हूँ अतः सदा
चोली को चोली ,घाघरे को घाघरा लिखूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शुक्रवार (10-07-2015) को "सुबह सबेरे त्राटक योगा" (चर्चा अंक-2032) (चर्चा अंक- 2032) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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