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Showing posts from July, 2015

फाँसी की सज़ा

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    फाँसीकी सज़ा को लेकर सबके अपने-अपने तर्क हैं कि यह सही है अथवा गलत किन्तु मेरी स्पष्ट धारणा है कि यह अपराध की प्रकृति और उद्देश्य पर निर्भर रखना चाहिए । दूसरी बात यह कि समस्त संसार में सज़ा के स्वरूप पर ही सायास किए जाने वाले अपराध से पूर्व अपराधियों का ध्यान अवश्यमेव रहता है कि वह पकड़े जाने पर किस हद तक सरलता पूर्वक सहने योग्य है अथवा कठोरता की किस सीमा तक असहनीय । सज़ाओं को कठोर अथवा यातनापूर्ण न रखे जाने का तथाकथित मानवतापूर्ण विचार मुझे तो आज तक पल्ले नहीं पड़ा । अवयस्कों के मामले में भी हमें अपनी करुणा को तनिक विश्राम देना होगा क्योंकि जानबूझकर–सोचसमझकर गंभीर अपराध करने वालों को हम उम्र के आधार पर छूट देकर भी ठीक नहीं कर रहे । दंड की भयानकता का भय ही तो हमें ग़लत कार्य करने से रोकता है । जिन सज़ाओं के तहत गंभीर अपराध करने वाले अत्यंत प्रभावशाली अथवा खौफ़नाक क़ैदी जेलों में बिना किसी कष्ट बल्कि सुविधासम्पन्न अवस्था में रहते हों औचित्यहीन हैं वे सज़ाएँ?करुणा के सिद्धान्त अथवा कृत्रिम मानवता की आड़ में जन्मजात कुत्तों की पूँछों को सीधा करने के प्रयास सर्वथा ऐसे प्रयोग हैं जिनके परिणाम हमे…

*मुक्त-मुक्तक : 738 - तुम मर चुके हो ॥

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कुछ ऐसा मेरे दिल पे अपना क़ब्ज़ा कर चुके हो ॥ यूँ ख़्वाबों में , ख़यालों में लबालब भर चुके हो ॥ ज़माना कह रहा है तुम ज़माने में नहीं अब, यकीं मुझको नहीं आता मगर तुम मर चुके हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 737 - बरगद के झाड़ ॥

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दुनिया के कैसे - कैसे झाड़ी - झंखाड़ ? कहलाते शीशम-पीपल-बरगद के झाड़ ॥ करके दूबाकार एक बौनी रचना , विज्ञापन में उसको दिखला-दिखला ताड़ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 736 - आँखें नहीं माँगूँ ?

मुझे लाज़िम न क्यों कोई शमा , क्यों एक भी जुगनूँ ? क्यों अंधा हो के भी मैं भीख में आँखें नहीं माँगूँ ? तो सुन - दिन-रात याँ रहती हुक़ूमत सिर्फ़ अँधेरों की , मना है देखने की बात भी करना , न है मौजूँ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 735 - है युवा पुरुषार्थ कर........

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हर घड़ी आलस्य में पड़ लेट कर ॥ मत बढ़ा चर्बी बड़ा मत पेट कर ॥ है युवा पुरुषार्थ कर भरसक अरे , सो के जीवन को न मटिया मेट कर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 734 - ज़िंदगी यह मौत सी......

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सिर्फ़ दो या चार ही दम को मिली ॥ उसपे तुर्रा यह फ़क़त ग़म को मिली ॥ किस सज़ा को उस ख़ुदा से इस क़दर , ज़िंदगी यह मौत सी हमको मिली ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 733 - उसका अरमान था.....

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उसका बेशक़ मैं कभी भी नहीं हबीब रहा ॥ उसके दिल के नहीं अंदर मगर क़रीब रहा ॥ उसका अरमान था होता अमीर कातिब मैं , मेरी तक़दीर मैं तासिन ग़रीब अदीब रहा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 732 - तक़दीर से तक़रार से ॥

जीत की हसरत लिए  हासिल क़रारी हार से, प्यार के बदले लगाती  ज़िंदगी की मार से , इतना आजिज़ आ चुका हूँ  मैं कि तौबा दूर ही – अब तो रहना है मुझे  तक़दीर से तक़रार से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 731 - पलँग-खाट वाले ॥

भटकते फिरें राजसी-बाट वाले ॥ ज़मीं पर पड़े हैं पलँग-खाट वाले ॥ बना दी है वो वक़्त ने उनकी हालत , रहे अब न घर के न वो घाट वाले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 730 - केले के छिलके:....

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केले के छिलके को न फैली काई बना दो ॥ पतली दरार को न चौड़ी खाई बना दो ॥ संदेह के उत्तुंग पर्वतों को यदि हो शक्य , विश्वास से अपने मिटा या राई बना दो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 729 - टाँगें उल्टी वो मोड़ता है.......

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टाँगें उल्टी वो मोड़ता है न  आँखों को ही वो फोड़ता ॥ ना उखाड़े वो चोंच ना  गरदन मरोड़ के तोड़ता ॥ हम परिंदों का वो दुश्मन  मारता हमको नहीं , बाँधकर पिंजरे में रखता या  पर क़तर के ही छोड़ता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 728 - भूल यही की कि.......

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बिन्दु को जिसने कई बार सिन्धु समझा था ॥ सिन्धु को जिसने कई बार बिन्दु समझा था ॥ हमने भी भूल यही की कि बार - बार उसे , न समझना था समझदार किन्तु समझा था !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

167 : मुक्त-ग़ज़ल - उसकी ख़िलाफ़त की थी ॥

जिसने मुझसे न लम्हा भर को मोहब्बत की थी , उसकी ही मैंने शब-ओ-रोज़ इबादत की थी !! मेरी बदक़िस्मती की दास्तान क्या कहिए ? मुझसे अपनों ने सरेआम बग़ावत की थी !! मानता क्या मैं बुरा दोस्तों की बातों का ? मैंने भूले न अदू की भी शिकायत की थी !! एक भी दुनिया में जिसका न तरफ़दार रहा , एक मैंने न कभी उसकी ख़िलाफ़त की थी ॥ उसने बख़्शा न मुझे एक भूल पर जिसके , मैंने संगीन गुनाहों पे रियायत की थी ॥ आख़िरश वो भी बुरी तरह टूट-फूट गया , मैंने जाँ से भी अधिक जिसकी हिफ़ाज़त की थी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 727 - मुझपे पत्थर चला ॥

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सबसे छुपकर न सबसे उजागर चला ॥ तू न थपकी न चाँटे सा कसकर चला॥ काँच का टिमटिमाता हुआ बल्ब हूँ , मत किसी ढंग से मुझपे पत्थर चला ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 726 - सोने में मज़ा आता है ॥

गाह चुपचाप कभी ढोल बजा आता है ॥ रोज़ ख़्वाबों में वो भरपूर सजा आता है ॥ नींद का मैं नहीं ग़ुलाम मगर सच मुझको , उसके दीदार को सोने में मज़ा आता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

नवगीत : 37 - माधुरी पकड़ ली ॥

कंगन नहीं मिला तो हमने चुरी पकड़ ली ॥ छूटा महानगर तो छोटी पुरी पकड़ ली ॥ कर-कर इलाज हारे पर रोग ना घटा जब , अपनी जगह से तिल भर दुःख-कष्ट ना घटा जब , औषधियाँ छोड़ हाथों में माधुरी पकड़ ली ॥ ईमानदारियों का पाया सिला बुरा जब , अच्छाइयों का बदला अक्सर मिला बुरा जब , हमने भी राह धीरे-धीरे बुरी पकड़ ली ॥ लिख-लिख के हमने देखा कुछ भी नहीं हुआ जब , हथियार भूलकर भी कोई नहीं छुआ जब , तजकर कलम करों में पैनी-छुरी पकड़ ली ॥ ( चुरी=चूड़ी , पुरी=नगरी , माधुरी=शराब ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

166 : मुक्त ग़ज़ल - मैं मसखरा लिखूँ ?

हल्दी से पीले तुमको कैसे मैं हरा लिखूँ ? हो रिक्त तुम तो क्यों तुम्हें भरा-भरा लिखूँ ? विधिवत् तुम्हारी साँसे चल रही हैं , है पता कुछ बात है कि तुमको निरंतर मरा लिखूँ ! क्या इसलिए कि तुम प्रगाढ़ मित्र हो मेरे , पीतल को भी तुम्हारे मैं कनक खरा लिखूँ ? उत्साह ,शक्ति ,स्वप्न और त्वरा से हीन जो यौवन हो ,कैसे मैं उसे नहीं जरा लिखूँ ? धंधा है जब तुम्हारा रुदन का ,विलाप का , सर्कस का कैसे तुमको फिर मैं मसखरा लिखूँ ? सच बोलने का दृढ़प्रतिज्ञ हूँ अतः सदा चोली को चोली ,घाघरे को घाघरा लिखूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

विचार : लड़की पैदा करना अनिवार्य है

कल खुद पर केरोसीन  छिड़ककर अत्महत्या करने वाली एक निःसंतान महिला का मृत्युपूर्व बयान कि ''परिवार एवं मोहल्ले वाले उसे बांझ-बांझ कहकर चिढ़ाते थे जिससे तंग आकर उसे यह कदम उठाना पड़ा '' यदि सत्य है तो अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है कि क्यों अब भी हम '' बच्चा गोद लेने से कतराते है '' एवं वे लोग कठोरतम दंड के पात्र हैं जो ऐसी आत्महत्याओं के प्रेरक हैं । इसके अलावा मैं तो कहता हूँ कि जनसंख्या-विस्फोट के इस युग में जिनके बच्चे नहीं हैं उन्हे तो पुरस्कृत किया जाना चाहिए ! पुनश्च , आश्चर्यजनक किन्तु सत्य कि आज भी हमारे यहाँ  महिला-आत्महत्या का एक कारण यह भी रहा  है कि वे निःसंतान नहीं थीं  बल्कि यह कि वे कई बच्चियों की माँ थीं किन्तु एक लड़का पैदा नहीं कर सकीं !!!!!!!! आज भी लोग लड़कियों को लड़के की तुलना में हेय समझते हैं यह अत्यंत पक्षपातपूर्ण , अन्यायपूर्ण और हानिकारक है और यही आलम रहा तो एक दिन जब लिंगानुपात भयावह ढंग से बिगड़ जाएगा _धर्मग्रंथों में निश्चय ही यह लिखा जाएगा कि ''पितृ-ऋण से उऋण होने के लिए एक लड़की पैदा करना अनिवार्य है ।'' सरकार को इस भेदभ…

*मुक्त-मुक्तक : 725 - बेशक़ करे न कोई यकीं

इक बार नहीं बल्कि कई बार किया है ॥ यूँ ही नहीं हमेशा यादगार किया है ॥ बेशक़ करे न कोई यकीं मेरी बात पर , दुश्मन को मैंने अपने मगर प्यार किया है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति