*मुक्त-मुक्तक : 722 - सर से न ताज गिरा ॥


कल गिरा देना मगर 
कम से कम न आज गिरा ॥
ऐ ख़ुदा मुझपे रहम कर 
न ऐसी गाज गिरा ॥
जान को दाँव पे मैंने 
लगा जो पाया अभी ,
जान ले ले तू मेरे 
सर से वो न ताज गिरा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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