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165 : मुक्त-ग़ज़ल - ज़िंदगी तेरे बिना भी.........

ज़िंदगी तेरे बिना भी जान चलती ही रही ॥ हाँ कमी बेशक़ तेरी हर आन खलती ही रही ॥ चाहकर भी मैं न तेरे मन मुताबिक़ बन सका , तू मेरे साँचे में अनचाहे ही ढलती ही रही ॥ होके पानी भी मैं तुझको बर्फ़ सा जमता रहा , और तू मेरे लिए लोहा भी हो गलती रही ॥ हाथ आते-आते तुम जो हाथ से फिसले मेरे , ज़िंदगी फिर ज़िंदगी भर हाथ मलती ही रही ॥ मेरी ख़ातिर जो तेरा दिल बस बुझाए ही रहा , उम्र भर वो शम्ए उल्फ़त मुझमें जलती ही रही ॥ दिल में जिस दिन से मेरे पैदा हुई हसरत तेरी , मारता जितना रहा ये उतना पलती ही रही ॥ ख़ुद को घिस-घिस कर मैं नन्हें दीप सा जब से जला , तब से सब दुनिया बुझाने मुझको झलती ही रही ॥ इक दफ़ा भी तो न ग़म घर से हुए मेरे दफ़ा ,

*मुक्त-मुक्तक : पंख चाहिए

लँगड़ों को पैरों , लूलों को सिवाय हाथों के ॥
बहरों को कानों , अंधों को सिवा दो आँखों के ॥
मुझ परकटे विहग को यूं ही पंख चाहिए –
जैसे मरों की चाह क्या अलावा साँसों के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 723 - मन से बच्चा लाओ तुम ॥

अक़्ल का चाहो भले  भरपूर कच्चा लाओ तुम ॥ लाख बूढ़ा ही सही पर  मन से बच्चा लाओ तुम ॥ ढूँढता फिरता हूँ मैं इक  आदमी यदि हो कहीं – छल-रहित ,पाखण्ड-च्युत , सोने सा सच्चा लाओ तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 722 - सर से न ताज गिरा ॥

कल गिरा देना मगर  कम से कम न आज गिरा ॥ ऐ ख़ुदा मुझपे रहम कर  न ऐसी गाज गिरा ॥ जान को दाँव पे मैंने  लगा जो पाया अभी , जान ले ले तू मेरे  सर से वो न ताज गिरा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति