Thursday, June 4, 2015

165 : ग़ज़ल - ज़िंदगी तेरे बिना भी


ज़िंदगी तेरे बिना भी जान चलती ही रही ॥
हाँ कमी बेशक़ तेरी हर आन खलती ही रही ॥
चाहकर भी मैं नहीं तेरे मुताबिक़ बन सका ,
तू मेरे साँचे में अनचाहे ही ढलती ही रही ॥
होके पानी भी मैं तुझको बर्फ़ सा जमता रहा ,
और तू मेरे लिए लोहा भी हो गलती रही ॥
हाथ आते-आते तू जो हाथ से फिसली मेरे ,
ज़िंदगी फिर ज़िंदगी भर हाथ मलती ही रही ॥
मेरी ख़ातिर जो तेरा दिल बस बुझाए ही रहा ,
उम्र भर वो शम्ए उल्फ़त मुझमें जलती ही रही ॥
दिल में जिस दिन से मेरे पैदा हुई हसरत तेरी ,
मारता जितना रहा ये उतना पलती ही रही ॥
ख़ुद को घिस-घिस कर मैं नन्हें दीप सा जब से जला ,
तब से सब दुनिया बुझाने मुझको झलती ही रही ॥
इक दफ़ा भी तो न ग़म घर से हुए मेरे दफ़ा ,
हर ख़ुशी हर बार बिन टाले ही टलती ही रही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 723 ( B ) पंखों की रज़ा

लँगड़ों को पैरों , लूलों को सिवाय हाथों के ॥
बहरों को कानों , अंधों को सिवा दो आँखों के ॥
मुझ परकटे परिंदे को है पंखों की रज़ा ,
जैसे मरों की चाह क्या अलावा साँसों के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, June 3, 2015

मुक्तक : 723 - मन से बच्चा लाओ तुम ॥



अक़्ल का चाहो भले भरपूर कच्चा लाओ तुम ॥
लाख बूढ़ा ही सही पर मन से बच्चा लाओ तुम ॥
ढूँढता फिरता हूँ मैं इक आदमी यदि हो कहीं –
छल-रहित ,पाखण्ड-च्युत ,सोने सा सच्चा लाओ तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Tuesday, June 2, 2015

मुक्तक : 722 - सर से न ताज गिरा ॥


कल गिरा देना मगर कम से कम न आज गिरा ॥
ऐ ख़ुदा मुझपे रहम कर न ऐसी गाज गिरा ॥
जान को दाँव पे मैंने लगा जो पाया अभी ,
जान ले ले तू मेरे सर से वो न ताज गिरा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...